1- माता-पिता का पूर्ण सात्त्विक होना, श्रद्धेय स्वामी जी व उनके दिव्य भव्य आध्यात्मिक भारत आध्यात्मिक विश्व के संकल्प हेतु दिव्य मानव निर्माण योजना से पूर्णतः सहमत होना आवश्यक है।

2- इस दिव्य मानव निर्माण योजना या ऋषि-ऋषिकाओं के प्रामाणिक उत्तराधिकारी बनाने की प्रक्रिया में माता-पिता व अभिभावकों की पूर्ण निष्ठा, सहमति व बिना शर्त का समर्पण होना चाहिए।

3- पतंजलि गुरूकुलम् में प्रवेश  विशेष वैदिक और संस्कृत शिक्षा के प्रति बच्चे की रुचि और योग्यता पर आधारित हैकक्षा प्रथम से कक्षा पांच तक के विद्यार्थियों हेतु प्रवेश की उपलब्धता है। 

4- 3 से 5 भाषाओं का बोध, ब्रेन की डिवाइन प्रोग्रैमिंग, 100% दिव्यता या पूर्ण सात्त्विकता में जीने का अभ्यास। आहार, विचार, वाणी, व्यवहार व स्वभाव के स्तर पर पूर्ण पवित्रता या आध्यात्मिकता। मेरा जन्म केवल मात्र वेदधर्म, व राष्ट्रधर्म के लिए जीने, इसके लिए सर्वस्व अर्पित करने एवं अन्ततः इसी के लिए मरना भी पड़े तो मुझे स्वीकार्य है। ये भाव बच्चों व उनके माता-पिता व अन्यों अभिभावकों में भरना- यह पतंजलि गुरुकुलम् का ध्येय है। इसके अतिरिक्त जिन माता-पिता का अपने सन्तानों को लेकर अन्य ध्येय है अन्य कॅरियर के बारे में सोचते हों वे इस मार्ग पर न आयें। क्योंकि संसार के अन्य मार्ग पर चलने वाली एक बहुत बड़ी भीड़ है।

5- माता-पिता बच्चों से कोई भी व्यक्तिगत अपेक्षा न रखें जैसे प्राचीन काल में राजवंश में पैदा हुआ व्यक्ति बचपन से प्रतिपल यही सोचता था, उसको वैसा ही 100» वातावरण व प्रशिक्षण दिया जाता था तथा वैसे ही उसके प्रशिक्षक होते थे, जो उसके मन, प्राण, आत्मा यहाँ तक कि अवचेतन मन में भी यह भाव गहरा बैठा देते थे कि तेरा जन्म राज करने, अपने साम्राज्य का न्याय पूर्ण विस्तार करने या राजधर्म के लिए हुआ है, वैसे ही इन बच्चों को हम ये विचार संस्कार देने वाले हैं कि तुम्हारा जन्म ऋषिधर्म, वेदधर्म, राष्ट्रधर्म व सेवाधर्म के लिए ही हुआ है।

6- ये बच्चे बड़े होकर चाहे साधु संन्यासी बने या कोई बड़े अधिकारी बनें चाहे किसी भी क्षेत्र में एक बड़ा दिव्य नेतृत्व करें। माता-पिता अपनी अपेक्षा इच्छा या कामना उन पर न थोंपे और लगभग 20 से 25 वर्ष तक उनके जीवन में कोई हस्तक्षेप न करें। अर्थात् भौतिक जन्म आपने दिया तथा सामान्य उत्तरदायित्व भी आपका है परन्तु उनके दिव्यजन्म को गुरुकुल में पूर्ण समर्पण से सम्पन्न होने दें।

7- बच्चों को बचपन से लेकर कक्षा 8 तक विविध भाषा, विविध विषय के शिक्षा का पाठ्यक्रम, शिक्षा-संस्कार, विविध कुशलताएं एवं श्रेष्ठ जीवन का अभ्यास, सब प्रकार की यथोचित तपस्या, यम-नियमों का पालन हम करायेंगे। इसमें माता-पिता की किसी भी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। 8वीं कक्षा के बाद उनको विशेष रूप से संस्कृत व वेदादिशास्त्रों व आंग्ल (English) भाषा में ही निष्णांत बनायेंगे।

8- आप मात्र जन्मदाता हैं। उनका आगे के जीवन का पूरा अधिकार परम श्रद्धेय स्वामी जी, पूज्य आचार्यजी व अन्य श्रेष्ठ गुरुजनों के हाथों में पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा व समर्पण से सौंपना होगा।कोई अवकाश नहीं, कोई अपेक्षा नहीं, कोई हस्तक्षेप नहीं, कोई आपत्ति नहीं गुरुकुल के नियमों मर्यादाओं एवं जीवन पद्धति पर शिक्षा पूर्ण होने तक ये नियम अनिवार्य होंगे। 8वीं कक्षा के उपरान्त यदि आवश्यक हुआ तो उनके अवकाश पर विचार किया जा सकता है।

9- हम ये मानते हैं कि मनुष्य के निर्माण के पांच मूलभूत साधन हैं प्रारब्ध, पुरुषार्थ, वातावरण, प्रशिक्षण व प्रशिक्षक। सब बातों के साथ वातावरण का भी व्यक्ति पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। हम बच्चों को श्रेष्ठ दिव्य मानव बनाना चाहते हैं लेकिन घर, परिवार, समाज व वैश्विक तकनीकी के दुरुपयोग व बुरे वातावरण से बच्चे तुरन्त प्रभावित होते हैं। बुरी बातों में सबसे बुरी बात यह है कि उनका प्रभाव, आदत व बुरा संस्कार तुरन्त पड़ता है तथा दीर्घकाल तक रहता है और उससे बाहर निकलने के लिए अथवा इस दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए अनावश्यक अनुत्पादक नकारात्मक बहुत अधिक पुरुषार्थ करना पड़ता है। इससे बेहतर है कि हम ऐसा अवसर ही न दें कि एक बार भी अभिभावक या विद्यार्थी इस तामसिक व राजसिक अशुभ वातावरण के सम्पर्क में आएं। विद्यार्थी काल में अशुभ संस्कारों के निरस्त होने से बाद में अशुभ निष्प्रभावी हो जाता है।

10-   यदि विद्याभ्यास पूरे हुए बिना कोई अभिभावक बच्चों को बीच में निकालते हैं तो उनको संस्था ने इस पर जो संसाधन व्यय किये हैं, उनको पूरा चुकाना पड़ेगा अन्यथा बच्चों के शिक्षा के प्रमाण-पत्र संस्था द्वारा नहीं दिये जायेंगे। एक विद्यार्थी के विद्याध्यन व उसके जीवन की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संस्था न्यूनतम 15 से 20 हजार रुपये प्रति विद्यार्थी प्रतिमाह खर्च करती है। वर्तमान में जो भी दान के रूप में आपसे शिक्षा सहयोग ले रहे हैं वह मात्र प्रतीकात्मक है। अतः विद्यार्थी को यदि बीच में ले जाते हैं अथवा विद्यार्थी जानबूझकर ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करते या कराते हैं कि विद्यार्थी को निष्कासित करना पड़े तो वार्षिक 1-50 लाख रुपये चुकाकर ही बालक- बालिका को ले जा सकते हैं व शिक्षा प्रमाण-पत्र हासिल कर सकते हैं, अन्यथा नहीं। 

11- किसी शैक्षणिक वर्ष के मध्य से बालक-बालिका को ले जाने पर भी सम्पूर्ण वर्ष में होने वाला व्यय ( 1-50 लाख) देय होगा।

12-   जैसे एक फाइटर पॉयलेट, डॉक्टर या इंजीनियर आदि को बनाने में बहुत संसाधन व अर्थ लगता है, वैसे ही इस कार्य में संस्था का बहुत कुछ दांव पर लगता है तथा संस्था के प्रमुख परम पूज्य श्रद्धेय श्री स्वामी जी सहित संस्था की श्रेष्ठ प्रतिभाओं का पूरा जीवन इस कार्य में लगा हुआ है, यह विद्याकार्य गुरुकुल संस्था के आत्मा के स्थान पर है। इन मूलभूत निर्देशों को माता-पिता भली-भाँति जानकर या समझकर ही गुरुकुल में प्रवेश लें।

13-   भारत में 20-25 वर्षों के बाद सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक आदि सभी क्षेत्रें में एक बहुत बड़ा दिव्य आध्यात्मिक नेतृत्व पतंजलि योगपीठ से शिक्षा-दीक्षा-संस्कार पाने वाले युवक युवतियाँ करेंगे। हम 2050 तक के महाशक्ति सम्पन्न भारत एवं भारत की 500 वर्षों की आधारशिला गुरुकुलम्, आचार्यकुलम्, विश्वविद्यालय एवं भारतीय शिक्षा बोर्ड के माध्यम से तैयार करेंगे।

विशेष:  संस्था के नियमों में समयानुसार-आवश्यकतानुसार परिवर्तन सम्भव है।