परम पूज्य स्वामी जी महाराज का सन्देश 

 

एक समाधान

जीवन को श्रेष्ठ, दिव्य, सफल और उन्नत बनाने के लिए 5 चीजों की आवश्यकता होती है

1.   श्रेष्ठ प्रारब्ध

2.  श्रेष्ठ पुरुषार्थ

3.  श्रेष्ठ वातावरण

4.  श्रेष्ठ प्रशिक्षण

5.  श्रेष्ठ प्रशिक्षक

इन पाँचों तत्वों को यहाँ पतंजलि गुरुकुलम् में मूर्त रूप दिया गया है, भागवत विधान से श्रेष्ठ प्रारब्ध वाली आत्माएं यहाँ इस दिव्य तीर्थस्थल पर आ रहीं हैं श्रेष्ठ प्रारब्ध वाली आत्माओं को अखंड, प्रचण्ड और उन्नत पुरुषार्थ करने के लिए सब तरफ से प्रेरित किया जाता है । पर्वतों के बीच पावन अलकनंदा के तट पर सुन्दर सुरम्य और शांत प्राकृतिक वातावरण पठन-पाठन और मानवीय मूल्यों के विकास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रदूषण से मुक्त इस प्राकृतिक दैवीय वातावरण में प्रातःप्रभृति सायं पर्यंत छात्र-छात्राओं को अपने पूर्वजों ऋषि-ऋषिकाओं की जीवनशैली के अनुरूप ढाला जाता है। इन्हें ऐसा प्रशिक्षण दिया जाता है जिससे ये वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय व वैश्विक जीवन को उन्नत बना कर एक विश्व नागरिक के रूप में प्रतिष्ठित होकर भारत को फिर से विश्वगुरु कहलाने का गौरव प्रदान करने में समर्थ हो सकें । स्वयं अपने पूर्वज ऋषि-ऋषिकाओं की भाँति परा व अपरा विद्या में निष्णात होकर अन्यों को भी निष्णात कर सकें। अपने पूर्वजों ऋषि-ऋषिकाओं द्वारा बताए गए जीवन के मूल्यों को प्रभात में उठने से लेकर सायंकाल शयन पर्यन्त विद्यार्थियों के जीवन में ढाला जाता है, यहाँ मात्र पुस्तकों  से नहीं अपितु आचरण से शिक्षा दी जाती है ।

वेदों ने, सभी आप्तपुरुषों ने, हमारे पूर्वज ऋषि-ऋषिकाओं ने हमें दो बातें सिखाईं है, दृष्टि व आचरण

हमारे विद्यार्थी जीवन में वैयक्तिक, पारिवारिक, सामजिक, आर्थिक, राजनैतिक, वैश्विक और आध्यात्मिक स्तर पर सम्यक् दृष्टि से संपन्न हों, क्योंकि सम्यक् और समग्र दृष्टि से संपन्न व्यक्ति ही सम्यक् और समग्रता से युक्त आचरण कर सकता है । हमारी दृष्टि और अभ्यास का परिणाम ही हमारा जीवन होता है।

पतंजलि गुरुकुलम् की उपादेयता – पतंजलि गुरुकुलम् के माध्यम से हम दिव्य व्यक्तित्व हेतु नेतृत्व व संस्कृत के हजारों प्रामाणिक विद्वान् व विदुषियाँ तैयार करना चाहते हैं जो ऋषि-ऋषिकाओं के प्रतिरूप हों जिनको जीवन व जगत का, व्यष्टि और समष्टि का, अभ्युदय और निःश्रेयस का जीवन के आध्यात्मिक और भौतिक पक्ष का समग्रता से बोध हो ।

भावी समाज का बचपन ही यदि दिव्य हो तो यौवन दिव्यता से युक्त होगा ही तदर्थ यह ‘पतंजलि गुरुकुलम्’ अनुष्ठान अहर्निश अपने ध्येय के लिए कटिबद्ध है ।